रहमतों का दौर- रमजान

May 9, 2019
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May 9, 2019
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मुस्लिम समुदाय के लोग इस महीने को परम पवित्र मानते हैं । रमजान को मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है। रमजान का महीना इबादत का महीना माना जाता है, इसे ‘मौसम-ए-बहार’ (बसंत) भी कहते हैं। सूरज के निकलने से पहले के खाने के साथ ही रमजान की शुरुआत हो जाती है। सूरज के डूबने के बाद के भोजन को इफ्तार कहा जाता है।

रमज़ान के महीने को कुल तीन अशरों (भागों) में बांटा गया है। पहले 10 दिनों को पहला अशरा कहते हैं जो रहमत का है, दूसरा अशरा अगले 10 दिनों को कहते हैं जो मगफिरत का है और तीसरा अशरा आखिरी 10 दिनों को कहा जाता है जिसे ‘जहन्नुम से बचाने का दौर कहा जाता हैं। इस दौरान हर मुसलमान रोजा रखते हैं और उनकी हर जायज दुआ कुबूल होती हैं। अगर कोई रोजेदार रोजे की हालत में जानबूझकर कुछ खा ले तो उसका रोजा टूट जाता है परन्तु अगर कोई गलती से कुछ खा-पी ले तो उसका रोजा नहीं टूटता। रमजान में कुल चार से पांच जुमे पढ़े जाते हैं, आखरी जुमा को अलविदा जुमा भी कहा जाता है। रमज़ान में एक दिन ‘शब-ए-कद्र’ का होता है। ‘शब-ए-कद्र’ को सारे मुसलमान रात भर अल्लाह की इबादत करते हैं। रोज़े के बाद जो ईद मनाई जाती है उसे ‘ईद-उल-फितर’ के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि रमज़ान के महीने में रोज़ा रखकर और अल्लाह की इबादत करके इंसान अपने ख़ुदा के करीब जाता है। ऐसा करने से इंसान खुदा से अपने किए हुए गुनाहों की तौबा मांग सकता है। स्त्री एवं पुरुष दोनों के लिए रोजा रखना एक फ़र्ज़ माना जाता है।
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक रमजान प्रत्येक वर्ष नवें महीने में मनाया जाता है।

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