करवा चौथ कथा, व्रत विधि एवं गाना

October 16, 2019
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October 16, 2019

करवा चौथ हिन्दू सुहागिन स्त्रियों का प्रमुख त्यौहार है। यह भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश हरियाणा ,मध्य प्रदेश और राजस्थान का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस व्रत में महिलाएं सूर्यउदय से पहले उठ स्नान करके सरगी ग्रहण करती है और फिर दिन भर निर्जल व्रत रखकर, रात्रि चन्द्रमा देख इस उपवास को खोलती है। इस साल करवा चौथ का व्रत 17 अक्टूबर को मनाया जायेगा।

करवा चौथ कथा

यह कहानी है एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा की। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक की वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे।

एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपने काम से घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ की उनकी बहन भूख प्यास से व्याकुल है, उन्होंने उसे भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्य देकर ही खा सकती है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखती है, उसे अर्घ्य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। तब उसकी भाभी उसे सच्चाई बताती है की गलत तरीके से व्रत टूटने पर देवता ने नाराज़ हो कर ऐसा किया है ।

सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।

इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना।ऐसा कह कर वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है।

हे श्री गणेश- मां गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

निर्जला व्रत की विधी एवं सरगी

करवा चौथ व्रत में सूर्य उदय से पूर्व सास के द्वारा बहु को दी गई सरगी जिसमे मेवे, फल आदि खाद्य सामग्री होती है ग्रहण की जाती है। फिर पूरा दिन सुहागन बिना कुछ खाये, बिना कुछ पिए बिताना होता है। शाम को सभी महिलाएं सज सवरकर साथ में पूजा करती हैं ।

करवा चौथ में पूजा के लिए गौरी और गणेश जी की पिली मिट्टी से मूर्ति बनाई जाती है । फिर उन्हें छोटे से चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित किया जाता है। माता गौरी का सिंदूर, बिंदी, चुन्नी तथा भगवान शिव को चंदन, फूल वस्त्र आदि पहनाते हैं।

श्री गणेश जी उनकी गोद में बैठते हैं । फिर सभी महिलाएं कर्वे से सजी थाली को सात बार घुमा कर  कथा के साथ पूजा करती है और शाम को चाँद देखकर उसे अर्ध्य देकर व्रत खोलती है ।

करवा चौथ गाना

पहले ६ फेरों के लिए गाना:

वीरो कुड़िये करवाड़ा, सर्व सुहागन करवाड़ा

ए कटी ना अटेरी ना, कुम्भ चरखरा फेरी ना

गवांद पैर पाई न, सुई विच धागा पाई ना

रूठड़ा मनाई ना, सुथरा जगाई ना

बेहेन प्यारी वीरा, चाँद चड़े ते पानी पीना

वे वीरो कुड़िये करवाड़ा, वे सर्व सुहागन करवाड़ा

सातवें और आखरी फेरे के लिए गाना:

वीरो कुड़िये करवाड़ा, सर्व सुहागन करवाड़ा

ए कटी तेरी नाया नी, कुम्भ चरखरा फेरी भी

आर पैर पाई भी, रूठड़ा मनाई भी

सुथरा जगाई भी,

वे वीरो कुड़िये करवाड़ा, वे सर्व सुहागन करवाड़ा

चाँद को अर्ध्य देना

रात को चाँद निकलने के बाद, सुहागन चाँद को छलनी से देख उसे जल व अर्ध्य देती हैं ।

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