गुरु का महत्व एक शिष्य के जीवन में

July 10, 2019
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July 10, 2019

अगर संस्कृत में ‘गुरु’ शब्द कि संधि विच्छेद की जाये तो वह गु + आरयू बन जाता है जिसका अर्थ होता है वो व्यक्ति जो हमें अँधेरे व अज्ञान के मार्ग से सही मार्ग दिखाता हो। गुरु अपने आप में ही एक बहुत ही सम्मानीय, अच्छाइयों एवं गुणों से परिपूर्ण शब्द है। भारतीय संस्कृति में एक विद्वान गुरु हुए हैं और वे सदियों से प्रचलित गुरु रहे हैं, जिनका नाम महर्षि वेदव्यास है। महर्षि वेदव्यास जी को प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में सबसे महान गुरु एवं गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक माना गया है। हिन्दुओं में एक और मान्यता यह है कि भगवान शिव भी इस ही दिन इंसानों के पहले गुरु बने थे,क्यूंकि इस ही दिन भगवान शिव ने सप्तऋषियों को योग सिखाया था। भगवान शिव को आदिगुरु भी कहा जाता है। महर्षि व्यास ने वेदों को ४ भागों में खंडित किया जिनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद , सामवेद और अथर्वेद रखे गए। इन्हे खंडित करने का कारण यह भी था कि सभी को वेदों की समझ रहे। वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेद व्यास के नाम से प्रचलित हुए। आषाढ़ मास कि पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं और यह पुरे भारत देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है।गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतू के आरम्भ में आती है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

ऐसी मान्यता हे कि इस दिन प्रात: काल स्नान पूजा आदि नित्यकर्मों को कर स्वच्छ वस्त्र धारण किये जाते हैं। फिर वेदव्यास जी के चित्र को सुगन्धित फूल या माला चढ़ाकर, अपने गुरु का ध्यान किया जाता है। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल, व माला अर्पण कर कुछ दक्षिणा भेंट कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। घर के पूजा स्थान या मंदिर में एक चौकी पर सफेद या केसरिया रंग का कपड़ा बिछाकर आटे से चोक बनाया जाता है और उस में व्यास जी की मूर्ति रखी जाती है। इसके अतिरिक्त वेद- पुराण या अन्य धार्मिक पुस्तकें रख कर भी व्यास जी कि पूजा की जा सकती है।

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